नीतीश पर चिराग के हमले और लोजपा की 143 सीटों पर दावेदारी की क्या राजनीति है, क्या सच में टूट रहा है एनडीए?


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पटना18 मिनट पहले

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  • लोजपा नेताओं का कहना है कि पार्टी इस बार 143 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है
  • 2015 में भाजपा और लोजपा साथ मिलकर लड़े थे, जबकि जदयू महागठबंधन में शामिल थी

‘हां, मैं चाहता हूं कि चिराग बिहार का मुख्यमंत्री बने। ये कब होगा? कैसे होगा? फिलहाल नहीं कह सकता। लेकिन दो साल में, पांच साल में या फिर उसके बाद के समय में ये जरूर होने जा रहा है।’ ये बातें अभी बीते अगस्त में लोक जनशक्ति पार्टी के पूर्व अध्यक्ष रामविलास पासवान ने अपने बेटे चिराग को लेकर एक न्यूज चैनल से कही थीं।

बिहार चुनाव से कुछ महीने पहले ही आए रामविलास पासवान के इस बयान से लोजपा की महत्वाकांक्षा भी पता चलती है। रामविलास पासवान ये भी कह चुके हैं कि चिराग में देश का नेतृत्व करने की काबिलियत है। चिराग लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और बिहार चुनाव का सारा काम खुद ही संभाल रहे हैं।

चिराग पासवान बीते कुछ समय से बिहार सरकार के कामकाज को लेकर लगातार सवाल उठाते रहे हैं। जून में चिराग ने प्रवासी मजदूरों के मुद्दे पर नीतीश सरकार को घेरते हुए कहा, ‘प्रवासियों की समस्या को बेहतर तरीके से निपटाया जा सकता था।’ जाहिर है उनके निशाने पर प्रवासी मामले में राज्य सरकार की शुरुआती विफलता और नीतीश का वह बयान था जिसमें उन्होंने प्रवासियों को न आने देने की बात कही थी।

अभी 16 जुलाई को जब गोपालगंज के बैकुंठपुर के सत्ताघाट पुल की अप्रोच रोड टूट गई थी, तब भी चिराग पासवान ने तीखी टिप्पणी की थी। ट्वीट कर कहा था, ‘264 करोड़ की लागत से बने इस पुल का एक हिस्सा ध्वस्त हो गया। इस तरह की घटनाएं जनता की नजर में जीरो करप्शन पर सवाल उठाती हैं। इसके लिए लोजपा मांग करती है कि उच्चस्तरीय जांच कर जल्द दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए।’

लोजपा 143 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी में!
चिराग पासवान बिहार की जमुई लोकसभा सीट से दो बार के सांसद हैं। उन्होंने पहली बार 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां से चुनाव जीता था और 2019 में भी यहां से करीब 2.5 लाख वोटों से जीते थे। अब खबरें हैं कि चिराग विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं। चिराग ने कहीं व्यक्तिगत बातचीत में कहा भी कि वो लड़कर और जीतकर दिखा देना चाहते हैं कि वो जनता के बीच से चुनकर आए हैं। उनका यह बयान भी नीतीश कुमार पर परोक्ष तंज ही मना जा रहा है।

लोजपा के प्रवक्ता अशरफ अंसारी के मुताबिक, पार्टी के नेता चाहते हैं कि लोजपा 143 सीटों पर चुनाव लड़े। हालांकि, आखिरी फैसला चिराग पर ही निर्भर करेगा। वहीं, लोजपा के इस बयान पर जदयू के प्रधान महासचिव केसी त्यागी ने पलटवार करते हुए कहा, ‘जदयू और भाजपा सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही हैं’।

लोजपा नेताओं का कहना है कि उनकी पार्टी हर उस सीट पर चुनाव लड़ेगी, जहां जदयू का उम्मीदवार होगा। जबकि, भाजपा के खिलाफ पार्टी नहीं लड़ेगी। साफ है जदयू और लोजपा में तनाव अब न सिर्फ बढ़ता जा रहा है, बल्कि जल्द ही यह खुलकर सामने आने को है। हालांकि भाजपा को लेकर चिराग की चुप्पी के भी अलग-अलग मतलब निकाले जा रहे हैं।

तो क्या 2015 के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में एनडीए का हिस्सा रही लोजपा इस बार अलग हो जाएगी? इस पर बिहार की राजनीति पर नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर बताते हैं, ‘लोजपा नेताओं की तरफ से ज्यादा सीटों पर लड़ने के बयान सिर्फ और सिर्फ ब्लैकमेलिंग है। लोजपा खुद भी नहीं चाहेगी कि वो गठबंधन से अलग होकर चुनाव लड़े।’

सुरेंद्र किशोर ये भी कहते हैं कि 2010 में लोजपा ने राजद के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। इसमें राजद ने 22 सीटें जीतीं और लोजपा 3 ही जीत सकी थी।

तस्वीर दिसंबर 2018 की है। लोकसभा चुनाव के लिए बिहार में एनडीए सीट को लेकर बंटवारा हुआ था। लोकसभा में भाजपा-जदयू 17-17 और लोजपा 6 सीटों पर लड़ी थी। एनडीए ने यहां की 40 में से 39 सीटें जीती थीं।

तस्वीर दिसंबर 2018 की है। लोकसभा चुनाव के लिए बिहार में एनडीए सीट को लेकर बंटवारा हुआ था। लोकसभा में भाजपा-जदयू 17-17 और लोजपा 6 सीटों पर लड़ी थी। एनडीए ने यहां की 40 में से 39 सीटें जीती थीं।

क्या इस सब में भाजपा की कोई भूमिका है?
बिहार के सियासी हलकों में ये चर्चा है कि भाजपा भी चाहती है कि लोजपा ज्यादा से ज्यादा सीटों पर लड़े, क्योंकि इससे जदयू के वोट पर ही असर पड़ेगा। इसके साथ ही अगर नतीजों के बाद भाजपा को जदयू से ज्यादा सीटें मिलती हैं, तो भाजपा छोटे भाई से बड़े भाई की भूमिका में आ सकती है।

हालांकि, सुरेंद्र किशोर इस तरह की चर्चाओं को खारिज करते हैं। वो कहते हैं कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व जब कह चुका है कि हम नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ेंगे, तो इस तरह की बातों का कोई मतलब नहीं रह जाता।

लोजपा की सीटें घटती रहीं, वोट शेयर भी घटता रहा
फरवरी 2005 के बाद जब अक्टूबर 2005 में बिहार में विधानसभा चुनाव हुए, तब लोजपा ने 203 सीटों पर चुनाव लड़ा। हालांकि, उसे सिर्फ 10 सीटों पर ही जीत मिल सकी और वोट शेयर भी फरवरी 2005 के मुकाबले घट गया। ऐसा इसलिए भी क्योंकि फरवरी 2005 में सरकार नहीं बनने का दाग लोजपा पर ही लगा।
2010 के चुनाव में लोजपा 75 सीटों पर लड़ी और 6.7% वोट हासिल किए। हालांकि, इस बार वो सिर्फ 3 सीटें ही जीत सकी। 2015 में लोजपा 42 सीटों पर उतरी और 2 ही जीत सकी। इस बार भी उसका वोट शेयर घटकर 4.8% रह गया।

नीतीश पर चिराग के हमले और लोजपा की 143 सीटों पर दावेदारी की क्या राजनीति है, क्या सच में टूट रहा है एनडीए?
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2005 में पासवान के पास थी ‘सत्ता की चाबी’

  • 28 अक्टूबर 2000 को रामविलास पासवान ने अपनी लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) बनाई। लोजपा ने अपना पहला चुनाव फरवरी 2005 में लड़ा। पहले चुनाव में लोजपा ने 178 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 17.3% वोट शेयर के साथ 29 सीटें जीतीं। यही लोजपा का अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन है।
  • फरवरी 2005 के चुनाव में किसी पार्टी को बहुमत मिला। रामविलास पासवान के पास ‘सत्ता की चाबी’ थी। वो जिस जगह जाते, उसकी सरकार बना सकते थे। लेकिन न ही उन्होंने राजद को समर्थन दिया और न ही भाजपा-जदयू गठबंधन को।
  • उस समय पासवान को कांग्रेस के कई नेताओं ने मनाया लेकिन पासवान बिहार में मुसलमान मुख्यमंत्री बनाने की मांग पर अड़ गए थे। दूसरी तरफ सरकार गठन के लिए पासवान जदयू के संपर्क में भी थे। ऐसा कहा जाता है कि जदयू ने लोजपा के 29 में से 18 विधायकों को अपनी तरफ कर भी लिया था, लेकिन एनडीए सरकार बनाने का दावा करता, उससे पहले ही विधानसभा भंग कर दोबारा चुनाव कराने का फैसला आ गया।

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