प्रवासियों को उनके अपने ही राज्यों में मिले रोजगार, ऐसी नीति बनाए सरकार : एसबीआई ईकोरैप


  • लॉकडाउन लागू होने के बाद करीब 58 लाख प्रवासी मजदूर अपने गृह राज्यों में लौट गए हैं
  • कुल प्रवासी मजदूरों में 90 % योगदान यूपी, बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल का

दैनिक भास्कर

Jun 10, 2020, 09:58 PM IST

नई दिल्ली. सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए, जिससे की प्रवासियों को उनके अपने राज्यों और खासतौर से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में ही रोजगार मिल जाए। यह बात बुधवार को भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की एक रिपोर्ट में कही गई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सरकार प्रवासी मजदूरों का एक व्यापक डाटा बेस बना सकती है। इसके लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन की ट्रैवल हिस्ट्र्री, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

लॉकडाउन लागू होने के बाद लाखों प्रवासी मजदूर अपने गृह राज्यों में वापस लौटे

एसबीआई ईकोरैप में कहा गया है कि लॉकडाउन लागू होने के बाद करीब 58 लाख प्रवासी मजदूर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे अपने गृह राज्यों में लौट गए हैं। ऐसे में हमें एक ऐसी सुविचारित नीति की जरूरत है, जो इन प्रवासी मजदूरों को उनके अपने गृह राज्यों में ही रोजगार दिला सकें। कोरोनावायरस को फैलने से रोकने के लिए सरकार ने 25 मार्च को देशव्यापी लॉकडाउन लगा दिया था। इसके बाद लाखों प्रवासी मजदूर अपने गृह राज्यों में लौट गए।

जिन जिलों में सबसे ज्यादा मजदूर लौटे उन पर सबसे पहले ध्यान दिया जाए

रिपोर्ट में कहा गया है कि हमें प्रवासी मजदूरों का एक डाटाबेस बनाने और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए एक नीति बनाने की जरूरत है। कॉल डिटेल रिकॉर्ड से यह पता लगाया जा सकता है कि किन-किन राज्यों के किन-किन जिलों में सबसे ज्यादा प्रवासी मजदूर वापस जा रहे हैं। इन जिलों से प्रवासी मजदूरों को रोजगार देने का काम शुरू किया जा सकता है।

90 % प्रवासी मजदूर यूपी, बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के

रिपोर्ट के मुताबिक देश के कुल प्रवासी मजदूरों में करीब 90 फीसदी योगदान उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल का है। इसलिए नीति ऐसी होनी चाहिए, जिसमें इन मजदूरों को रोजगार देने की समुचित व्यवस्था हो। चूंकि बड़े पैमाने पर प्रवासी मजदूर अपने राज्यों में वापस लौट गए हैं, इसलिए उन राज्यों के लिए अधिकाधिक मजदूरों को रोजगार दे पाना काफी कठिन कार्य होगा।

बैंक मनरेगा से जुड़े प्रवासी मजदूरों को जीविका लोन दे सकते हैं

रिपोर्ट में कहा गया है कि जॉब कार्डधारकों को जीविका लोन देने का काम यदि बैकों को दे दिया जाए, तो गरीबों के हाथ में काफी पैसा पहुंचेगा। बैंक एक सरल आवेदन प्रक्रिया के जरिये मनरेगा कार्डधारकों को योग्य राशि का कुछ हिस्सा (मान लिया जाए 40 फीसदी) लोने के रूप में दे सकते हैं। इस जीविका लोन के ब्याज की गारंटी सरकार ले सकती है। इस पर सरकार को बहुत मामूली करीब 4,000 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। मनरेगा कार्डधारक श्रम का योगदान कर इस लोन का भुगतान कर सकते हैं।

कुछ समय के लिए मनरेगा मजदूरी को न्यूनतम मजदूरी कानून से जोड़ा जाए

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मनरेगा का संबंध न्यूनतम मजदूरी कानून से नहीं है। इसकी वजह से कई मामलों में मनरेगा मजदूरी राज्यों की न्यूनतम कृषि मजदूरी से कम होती है। सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए। कम से कम कुछ समय के लिए इस पर फिर से विचार किया जा सकता है।



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