विपक्षी नेता फरहतउल्ला बाबर बोले- सेना ने कभी संविधान को नहीं माना, इमरान खान सरकार भारत से रिश्ते सुधारे


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इस्लामाबाद9 मिनट पहले

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फरहतउल्ला बाबर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी यानी पीपीपी के सीनियर लीडर और प्रवक्ता हैं। वे पीपीपी चेयरमैन बिलावल भुट्टो के करीबी माने जाते हैं। (फाइल)

  • पाकिस्तान के लगभग तमाम विपक्षी नेता इन दिनों सरकार से ज्यादा फौज पर निशाना साध रहे हैं
  • नवाज शरीफ की बेटी मरियम ने सोमवार को कहा था- सिलेक्टेड पीएम के सिलेक्टर्स को जनता की बात सुननी होगी

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के सीनियर लीडर और प्रवक्ता फरहतउल्ला बाबर ने फौज पर आरोप लगाया है कि वो देश के संविधान को नहीं मानती। बाबर के मुताबिक, अगर फौज ने देश के संविधान को माना होता तो आज हालात कुछ और होते। बाबर ने कहा कि इमरान खान सरकार को पड़ोसी देश भारत से रिश्ते सुधारने पर जोर देना चाहिए।

बाबर के पहले सोमवार को पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की बेटी मरियम नवाज ने भी फौज पर निशाना साधा था। मरियम ने कहा था- सिलेक्टेड पीएम इमरान के सिलेक्टर्स को अवाम की आवाज सुननी चाहिए।

सेना की जिम्मेदारी पर सवाल
कॉन्फ्रेंस ऑफ साउथ एशियन्स अगेंस्ट टेरेरिज्म एंड फॉर ह्यूमन राइट्स (SAATH) की मीटिंग के दौरान बाबर ने अपने विचार रखे। उन्होंने माना कि पाकिस्तान में सैन्य शासन इसलिए भी रहा क्योंकि ताकतवर फौज को अपने आर्थिक हित देखने थे। इसके लिए संघीय और लोकतांत्रिक ढांचे की अनदेखी हुई। बाबर ने कहा- हमारी संसद फौज की जवाबदेही तय करने में नाकाम रही। पाकिस्तान के जनरल दिल से कभी संविधान को स्वीकार नहीं कर पाए। वे फौज को देश का सबसे बड़ा संगठन मानते रहे।

भारत और चीन की मिसाल
बाबर ने भारत और पाकिस्तान के रिश्तों का जिक्र करते हुए चीन की मिसाल दी। कहा- आप देख सकते हैं कि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद है, इसके बावजूद दोनों देशों के बीच ट्रेड रिलेशन्स मजबूत हैं। ये पाकिस्तान क्यों नहीं कर सकता। अगर पाकिस्तान आज भारत से बेहतर रिश्ते रखता है तो इससे लोकतंत्र के साथ अर्थ व्यवस्था भी मजबूत होगी।

सेना का विरोध बढ़ रहा है
बाबर ने कहा- पाकिस्तान में फौज का विरोध बढ़ रहा है। सबसे पहले ये पश्तून इलाके में शुरू हुआ। अब यह देश के सबसे बड़े सूबे पंजाब तक पहुंच गया है। पाकिस्तानी फौज में सबसे ज्यादा सैनिक और अफसर यहीं से आते हैं। इसमें संसद की भी गलती है। उसने फौज को कभी जवाबदेह नहीं बनाया। अब सरकार भी मीडिया पर दबाव बनाकर विरोध को दबाने की कोशिश कर रही है।



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