By 2100 the temperature of the country will rise to 4.4 ° C; Many areas will not be habitable for humans, 34 million jobs will go by 2030 | 80 साल में देश का तापमान 4.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा; कई इलाकों में इंसान नहीं रह पाएंगे, इससे 2030 तक 3.4 करोड़ नौकरियां जाएंगी


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नई दिल्लीएक घंटा पहले

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दिल्ली में इस बार पारा 45 डिग्री के पार चला गया था।

  • इस सदी के अंत तक धरती का तापमान 3 से 5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा, भारत का तापमान 4.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ने का अनुमान
  • मौसम विभाग के पास 1901 से क्लाइमेट डेटा, इसके मुताबिक 2019 7वां सबसे गर्म साल था, इस साल तापमान 0.36 डिग्री सेल्सियस बढ़ा था
  • बढ़ती गर्मी की वजह से 2030 तक साउथ एशिया के देशों में 4.3 करोड़ से ज्यादा नौकरियां जाएंगी, सबसे ज्यादा असर भारत पर पड़ेगा

अगर मैं कहूं कि इस सदी के आखिर तक यानी 2100 तक दुनिया के कई ऐसे इलाके इंसानों के रहने लायक नहीं रहेंगे। तो हो सकता है कि आप डर जाएं, लेकिन सच यही है। अभी जो महीना बीता यानी जुलाई का महीना, उसमें दुनिया का तापमान 16.72 डिग्री सेल्सियस रहा, जो औसत से 0.92 डिग्री सेल्सियस ज्यादा था। ये आंकड़ा वर्ल्ड मीटियरोलॉजिकल ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएमओ) का है।

डब्ल्यूएमओ के मुताबिक, जो 20 सबसे गर्म साल रहे हैं, वो पिछले 22 साल में रहे हैं। इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि धरती का तापमान हर साल बढ़ ही रहा है। डब्ल्यूएमओ का अनुमान है कि अगर यही ट्रेंड चलता रहा, तो 2100 तक धरती का तापमान 3 से 5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो धरती के कई इलाकों में इंसानों का रह पाना आसान नहीं होगा।

भारत के हालात भी कुछ ऐसे ही रहने हैं। इसी साल जून में मिनिस्ट्री ऑफ अर्थ साइंसेस की क्लाइमेट चेंज पर एक रिपोर्ट आई थी। क्लाइमेट चेंज पर सरकार की ये पहली रिपोर्ट है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, 2100 तक भारत का तापमान 4.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा।

2015 में क्लाइमेट चेंज को लेकर पेरिस में एक समझौता हुआ था, जिसके तहत 2100 तक धरती के तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस के अंदर रोकने का टारगेट है। हालांकि, अभी जो रिसर्च आ रही हैं, उनमें इस टारगेट के अंदर टेंपरेचर को रोक पाना मुश्किल लग रहा है।

भारत की क्या हालत: 1901 के बाद 2019 7वां सबसे गर्म साल रहा
भारतीय मौसम विभाग 1901 से क्लाइमेट डेटा रख रहा है। इसी साल जनवरी में मौसम विभाग ने एक रिपोर्ट जारी की थी। इसमें कहा था कि 1901 के बाद 2019 7वां ऐसा साल है, जो सबसे गर्म रहा। 2019 में देश का तापमान 0.36 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया। ताज्जुब की बात ये भी है कि जो 7 सबसे गर्म साल रहे हैं, वो सभी 2009 से लेकर 2019 के बीच 11 सालों में दर्ज किए गए हैं।

अब तक सबसे गर्म साल 2016 रहा है। उस साल देश का तापमान 0.72 डिग्री सेल्सियस बढ़ा था। उसके बाद 2009 में 0.56 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ा था।

By 2100 the temperature of the country will rise to 4.4 ° C; Many areas will not be habitable for humans, 34 million jobs will go by 2030 | 80 साल में देश का तापमान 4.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा; कई इलाकों में इंसान नहीं रह पाएंगे, इससे 2030 तक 3.4 करोड़ नौकरियां जाएंगी

पिछले साल लू की वजह से 373 जानें गई थीं
मिनिस्ट्री ऑफ स्टेटिस्टिक्स के पास जो डेटा है, उसके मुताबिक 2019 में देश के अलग-अलग हिस्सों में 157 दिन लू चली है। जबकि, 2018 में 86 दिन ही लू चली थी। इस साल भी देश के कई हिस्सों में तापमान 47 डिग्री के ऊपर पहुंच गया। दिल्ली, बिहार, उत्तर प्रदेश में रेड अलर्ट जारी किया गया।

इस साल तो कोरोना की वजह से लॉकडाउन लगा रहा, लेकिन पिछले साल तो इतनी गर्मी पड़ी थी कि बिहार में 5 दिन तक स्कूल-कॉलेज और कोचिंग सेंटर बंद रखने पड़े थे।

लू की वजह से हर साल सैकड़ों जानें भी जाती हैं। पिछले साल ही लू की वजह से देशभर में 373 लोगों की जान गई थी। जबकि, कोल्ड वेव्स से 61 लोगों की मौत हुई थी। 2010 से लेकर 2019 तक 10 साल में लू की वजह से 6 हजार 355 लोगों की मौत हुई है।

By 2100 the temperature of the country will rise to 4.4 ° C; Many areas will not be habitable for humans, 34 million jobs will go by 2030 | 80 साल में देश का तापमान 4.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा; कई इलाकों में इंसान नहीं रह पाएंगे, इससे 2030 तक 3.4 करोड़ नौकरियां जाएंगी

क्यों कई इलाके इंसानों के रहने लायक नहीं रहेंगे?
कोई भी जगह इंसानों के रहने के लायक है या नहीं, इसका पता “वेट बल्ब थर्मामीटर’ से लगाया जाता है। इसमें हवा की नमी का टेंपरेचर मापा जाता है। हमारे शरीर का टेंपरेचर 37 डिग्री सेल्सियस होता है, जबकि स्किन का 35 डिग्री सेल्सियस और पसीने के जरिए हम अपने शरीर के टेंपरेचर को कंट्रोल में रखते हैं।

लेकिन, जब स्किन का टेंपरेचर 35 डिग्री सेल्सियस के ऊपर पहुंच जाता है, तो हमारे लिए पसीने के जरिए भी शरीर का टेंपरेचर कंट्रोल करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कोई अच्छे-खासे तंदरुस्त व्यक्ति की भी मौत हो सकती है। एक रिपोर्ट बताती है कि 2015 में वेट बल्ब टेंपरेचर 35 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंच गया था और इसी साल देश में सबसे ज्यादा मौतें हुई थीं।

जर्मनी की संस्था जर्मन वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक, क्लाइमेट चेंज के मामले मेंं भारत दुनिया का 14वां सबसे संवेदनशील देश है। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि भारत के 60 करोड़ लोग यानी 45% आबादी ऐसी जगह रहती है जहां 2050 तक जलवायु परिवर्तन के गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

अमेरिका की मैसेच्युएट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) का अनुमान है कि सदी के अंत तक धरती की सतह का तापमान 4.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा, जबकि औसत तापमान में भी 2.25 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी होने की आशंका है। अगर ऐसा होता है तो दक्षिणी एशिया के कई इलाकों पर इंसानों का रहना मुश्किल हो जाएगा।

इतना ही नहीं बढ़ती गर्मी से 3.4 करोड़ भारतीयों की नौकरियां भी जाएंगी
पिछले साल इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट आई थी। इस रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि गर्मी बढ़ने की वजह से 2030 तक साउथ एशिया में 4.3 करोड़ से ज्यादा नौकरियां खत्म हो जाएंगी। इसका सबसे ज्यादा असर भारत पर पड़ेगा, क्योंकि 2030 तक बढ़ती गर्मी से 3.4 करोड़ लोगों की नौकरियां चली जाएंगी।

सबसे ज्यादा असर मजदूरों पर पड़ेगा। आईएलओ की रिपोर्ट के मुताबिक, मजदूरों को सुबह 10 से शाम 5 बजे तक काम करना पड़ता है। लेकिन, गर्मी की वजह से दिन में काम करना मुश्किल होगा। इससे काम के घंटों में कमी आएगी और मजदूरों की कमाई पर असर पड़ेगा।

By 2100 the temperature of the country will rise to 4.4 ° C; Many areas will not be habitable for humans, 34 million jobs will go by 2030 | 80 साल में देश का तापमान 4.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा; कई इलाकों में इंसान नहीं रह पाएंगे, इससे 2030 तक 3.4 करोड़ नौकरियां जाएंगी

2050 तक हर 45 में से 1 व्यक्ति क्लाइमेट चेंज के कारण माइग्रेट होगा
बढ़ती गर्मी और क्लाइमेट चेंज का असर लोगों की आम जिंदगी पर किस तरह पड़ेगा, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2050 तक हर 45 में से 1 व्यक्ति इन्हीं वजहों से माइग्रेट करने पर मजबूर होगा। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज यानी आईपीसीसी का अनुमान है कि क्लाइमेट चेंज के वजह से 2050 तक 20 करोड़ लोग माइग्रेशन करेंगे। ये आंकड़ा 1 अरब के पार भी जा सकता है।

ऐसे लोग क्लाइमेट चेंज के कारण अपनी जगह छोड़कर दूसरी जगह जाते हैं, उन्हें “क्लाइमेट रिफ्यूजी’ या “क्लाइमेट माइग्रेंट्स’ कहते हैं।

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