By the help of google jaipur traffic Policeman introduced two missing brothers in lockdown who were separated nine years ago in kota rajasthan | लॉकडाउन में ट्रैफिक पुलिसकर्मी ने डेढ़ महीने तक गूगल सर्च पर की खोजबीन, नौ साल पहले बिछुड़े दो भाइयों को मिलवाया


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जयपुर5 मिनट पहलेलेखक: विष्णु शर्मा

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राजस्थान में कोटा जंक्शन में वर्ष 2011 में बिछुड़े गोरखपुर यूपी के दोनों भाईयों को मिलवाने में मदद करने वाले जयपुर ट्रेफिक पुलिस के एएसआई नरेश सिंह

  • गोरखपुर यूपी निवासी दिमागी रुप से कमजोर छोटे तिवारी अपने भाई से कोटा जंक्शन पर बिछड़े थे
  • एएसआई नरेश सिंह चार माह पहले छोटे तिवारी को भटकता देखा तब घर से बना खाना लाकर खिलाते
  • लापता व्यक्ति ने बातचीत में गोरखपुर में घर बताया तब गूगल पर पता खोजने में जुटे और कामयाब हुए

कोरोना संकटकाल में लॉकडाउन की वजह से 10 साल पहले लापता हुआ एक दिमागी रूप से कमजोर व्यक्ति अपने परिवार से मिल सका। इसके बाद उसके परिवार की खुशियां वापस लौट आई। किसी फिल्मी स्क्रिप्ट सी लगने वाली यह कहानी है उत्तरप्रदेश के रहने वाले 50 वर्षीय छोटे तिवारी उर्फ कालिका प्रसाद की। दिमागी रुप से कमजोर छोटे तिवारी करीब 10 साल पहले अपने छोटे भाई प्रमोद तिवारी के साथ रोजगार के सिलसिले में उत्तरप्रदेश से राजस्थान में कोटा जंक्शन पहुंचे थे।

सफर के बीच उनके भाई प्रमोद तिवारी को नींद की झपकी आ गई। इस बीच दोनों भाई कोटा जंक्शन पर बिछुड़ गए। छोटे तिवारी का पता नहीं चला। उनकी तलाश और खोजबीन में भाई प्रमोद ने कई सालों तक दरबदर इधर-उधर तलाश किया। फिर भाई से मिलने की उम्मीद ही छोड़ दी। लेकिन इसी बीच लॉकडाउन में जयपुर में सहकार मार्ग रोड पर 22 गोदाम सर्किल पर ड्यूटी दे रहे यातायात पुलिस के सहायक पुलिस निरीक्षक (एएसआई) नरेश सिंह इन भाईयों के लिए देवदूत बनकर आए। जिन्होंने करीब डेढ़-दो महिनों तक गूगल सर्च पर खोजबीन और सूझबूझ से इन बिछुड़े हुए भाईयों को फिर से मिला दिया।

सफर में नींद आ गई, कोटा जंक्शन पर ट्रेन पहुंची तब भाई लापता हो गया
उत्तरप्रदेश में गोरखपुर जिले के गांव तिवारी नगवा, जगदीशपुर के रहने वाले प्रमोद तिवारी ने बताया कि वे बांसवाड़ा में जॉब करने के लिए हम दोनों भाई वर्ष 2011 में गोरखपुर स्थित अपने घर से निकले थे। सफर के दौरान मुझे नींद आ गई। हमारी ट्रेन कोटा जंक्शन पर ट्रेन पहुंची। तब ट्रेन वहां रुकी। इस बीच मेरी आंख खुली तो देखा कि मेरा साथ मौजूद भाई छोटे तिवारी नहीं है। मैं घबरा गया। वहां तीन चार घंटे स्टेशन व कोटा शहर में इधर-उधर काफी तलाश किया। लेकिन कुछ पता नहीं चरेहला। रोते बिलखते वापस गांव लौट गया। इसके बाद भी राजस्थान आकर तलाश जारी रखी। थक हारकर भाई का बिछड़ना किस्मत मान लिया।

By the help of google jaipur traffic Policeman introduced two missing brothers in lockdown who were separated nine years ago in kota rajasthan | लॉकडाउन में ट्रैफिक पुलिसकर्मी ने डेढ़ महीने तक गूगल सर्च पर की खोजबीन, नौ साल पहले बिछुड़े दो भाइयों को मिलवाया

जयपुर में 22 गोदाम सर्किल पर अपने भाई छोटे तिवारी(गले में नारंगी स्कार्फ) से 9 साल बाद मिलने पर भावुक हो गए प्रमोद तिवारी(सफेद शर्ट)

प्रमोद तिवारी के मुताबिक उन्हें लगता था कि मेरे भाई कभी नहीं मिलेंगे। इस बीच चार पांच दिन पहले गांव से प्रधान का फोन आया। उस वक्त मैं बांसवाड़ा से धागा मिल में ड्यूटी पर था। उन्होंने जयपुर ट्रेफिक पुलिस में एएसआई नरेश सिंह के मोबाइल नंबर दिए। तब नरेश ने प्रमोद तिवारी से संपर्क कर उसे छोटे तिवारी वीडियो और फोटो व्हाट्सएप पर भेजा। तब प्रमोद ने 10 साल पहले लापता अपने भाई छोटे तिवारी को पहचान लिया। उसे लेने तत्काल जयपुर आ गया। जहां 22 गोदाम सर्किल पर एएसआई नरेश सिंह की मदद से भाई छोटे तिवारी को 10 साल बाद देखा तो गले मिलकर रो पड़े। इसके बाद उसे गांव लेकर लौट गए।

टूटे फुटे पते को गूगल पर सर्च कर लोगों से संपर्क किया, सोशल मीडिया पर फोटो व वीडियो शेयर की
जयपुर ट्रेफिक पुलिस के एएसआई नरेश सिंह ने बताया कि करीब 10 साल से छोटे तिवारी जयपुर में 22 गोदाम के आसपास खानाबदोश रहता था। यह दिमागी कमजोर है। मैंने इसको चार साल पहले भी ड्यूटी के दौरान यहां देखा था। यह आसपास की दुकानों व पेट्रोल पंप वालों की मदद से खाना खा लेता था। लेकिन लॉकडाउन की वजह से सब बंद हो गया। तब यह अकेला रह गया। तब हमें दया आ गई और हमने इसकी देखभाल शुरु की। खान पीने का ध्यान रखा। इससे बातचीत करने लगे। तब यह धीरे धीरे हमसे खुलने लगा।

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प्रमोद तिवारी व उनके बड़े भाई छोटे तिवारी को मिलाने में मदद करने वाले एएसआई नरेश सिंह और उनके साथी पुलिसकर्मी

एएसआई नरेश सिंह के मुताबिक सबसे पहले इसने अपना नाम छोटे तिवारी और पिता का नाम बताया। अपना घर सिर्फ बांस गांव, गोरखपुर में होना बताता था। इसने बताया कि गांव में बड़ा सा मंदिर है। जिसमें यह पूजा करता था। यह भी बताया कि उसने एक बार शंकर तिवारी को चुनाव में वोट दिया था। छोटे तिवारी यूपी भाषा बोलता था। तब एएसआई नरेश सिंह ने छोटे तिवारी को उसके परिवार से मिलाने की ठान ली। वह अपने साथी कांस्टेबल कृष्ण कुमार के साथ डेढ़ महिने तक गूगल सर्च पर बास गांव गोरखपुर और शंकर तिवारी का नाम सर्च कर जानकारी जुटानी शुरु की।

गोरखपुर के बास थाने में पुलिस, स्थानीय मीडियाकर्मियों से लगाातार संपर्क किया, तब प्रधान का नंबर मिला

एएसआई नरेश सिंह ने बताया कि छोटे तिवारी बास गांव बताता था। तब गूगल से नंबर जुटाकर उन्होंने बास पुलिस थाने में फोन से संपर्क किया। तब थाने वालों ने किसी स्थानीय प्रधान का मोबाइल नंबर दिया। एएसआई नरेश सिंह ने बताया कि इस दौरान मैंने वहां पांच-दस मीडियाकर्मियों से भी फोन पर बातचीत की। वहां के कई अन्य स्थानीय लोगों से फोन के जरिए संपर्क करता रहा। मैं छोटे तिवारी की फोन पर बात करवाता था। रोजाना व्हाट्सएप पर वहां के लोगों को छोटे तिवारी की फोटो भेजता था।

आखिरकार जुलाई माह के पहले सप्ताह में एएसआई नरेश की गोरखपुर में प्रधान इंद्रजीत से बातचीत हुई। तब उन्हें बताया कि छोटे तिवारी ने किसी शंकर प्रधान को वोट दिया था। तब इंद्रजीत ने कहा कि शंकर करीब 10 साल पहले जगदीशपुर तिवारी नगवा के प्रधान थे। इंद्रजीत ने उस गांव के प्रधान अनिल कुमार त्रिपाठी के नंबर दिए। तब एएसआई ने अनिल त्रिपाठी को पूरा वाकया बताया। प्रधान अनिल ने बांसवाड़ा में मौजूद प्रमोद तिवारी को एएसआई नरेश के मोबाइल नंबर देकर संपर्क करने को कहा। इस तरह उनकी लापता हुए छोटे तिवारी के भाई प्रमोद से बातचीत हुई। इसके बाद वह जयपुर आकर अपने भाई को ले गया।

छोटे तिवारी के मनपसंद का खाना घर से बनवाकर लाते और खिलाते थे एएसआई नरेश सिंह
जयपुर ट्रेफिक पुलिस में एएसआई नरेश सिंह के मुताबिक छोटे तिवारी उनसे अक्सर बातचीत में कहता कि मैं मुन्नी के हाथ का बना खाना खाऊंगा। तब पता चला कि मुन्नी इनके भाई की पत्नी है। उसको छोटे तिवारी बहन मानता था। ऐसे में एएसआई नरेश सिंह ड्यूटी पर आने से पहले छोटे तिवारी की अपनी पत्नी से मोबाइल फोन पर यह कहकर बात करवाते थे कि मुन्नी तुमसे बात करेगी।

तब एएसआई नरेश सिंह की पत्नी को मुन्नी समझकर छोटे तिवारी कहता कि मुन्नी आज मुझे यह खाने में यह खाना है। तब एएसआई नरेश सिंह की पत्नी वही खाना बनाती। जिसको वह 22 गोदाम स्थित अपने ड्यूटी प्वाइंट पर लेकर पहुंचते और फिर छोटे तिवारी को खाना खिलाते। वे उसके लिए बोतल में अलग से गर्म पानी व काढ़ा भी बनाकर लेकर आते। उसको दवा भी देते। ताकि छोटे तिवारी का कोरोना वायरस से बचाव हो गए।

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